बाहर देवदार के लंबे पेड़ों पर बर्फ जम चुकी थी और खिड़कियों के शीशों पर धुंध की पतली परत चढ़ी हुई थी। हवेली के भीतर जलती फायरप्लेस की गर्मी भी उस अजीब बेचैनी को कम नहीं कर पा रही थी जो पिछले कुछ दिनों से पूरे घर में फैल चुकी थी।
रूहानी सोफे पर चुपचाप बैठी थी।
उसके सुनहरे बाल कंधों पर बिखरे थे और नीली आंखें सामने रखी चाय पर टिकी थीं, लेकिन उसका ध्यान कहीं और था। सामने बैठी मालिनी की आंखों में डर साफ दिखाई दे रहा था।
कमरे में बस घड़ी की टिक-टिक सुनाई दे रही थी।
मालिनी ने धीरे से कहा,
“अद्वैत साहब के यहां आने के पीछे कोई और वजह है… मुझे पूरा यकीन है।”
रूहानी की नीली आंखें हल्का सा सिकुड़ीं। उसने कुछ पल सोचा, फिर धीमी आवाज में बोली,
“...हाँ, शायद तुम सही कह रही हो।”
मालिनी थोड़ा आगे झुकी। उसके चेहरे पर चिंता साफ दिखाई दे रही थी।
“आपको सावधान रहना होगा, मालकिन। "
वह सोफ़े पर थोड़ा आगे झुकी और अपने असली डर को ज़ुबान पर लाई, "मुझे डर है कि वह यहाँ बच्चों को अपने साथ वापस ले जाने के लिए आया है। वह जो कह रहा है कि वह एक महीने में चला जाएगा और उसने अपनी याददाश्त खो दी है, मुझे उसकी इस बात पर बिल्कुल भरोसा नहीं है।"
कमरे की हवा अचानक और भारी हो गई। दोनों चुप हो गईं, लेकिन अद्वैत का नाम और बच्चों को खोने का डर अब उन दोनों के दिलों में पूरी तरह घर कर चुका था।
मालिनी ने रूहानी की तरफ देखा और सीधे शब्दों में उसका हौसला बढ़ाते हुए कहा, "आप अपनी जान बचाने के लिए वहाँ से भागी थीं, यह सच है। लेकिन उससे भी ज़्यादा ज़रूरी बात यह है कि आप अपने बच्चों की रक्षा करने के लिए वहाँ से दूर आई थीं।"
रूहानी ने अद्वैत के साथ पुराने दिनों को याद किया। उसने अपनी बात पर ज़ोर देते हुए धीरे से अपनी आँखें बंद कीं और सहमति में अपना सिर हिलाया। उसने कहा, "हाँ, मैं समझती हूँ।, मालिनी आंटी"
रूहानी के चेहरे पर तनाव साफ़ दिख रहा था। उसने घबराहट में अपने हाथों को आपस में ज़ोर से भींच लिया, जिससे उसकी उंगलियों के पोर सफ़ेद पड़ गए ।
उसने अपनी चिंताओं को दबाते हुए कहा, "...नहीं। इतने सालों से वह बच्चों को लेने नहीं आया तो अपने बच्चों को क्यों अपने साथ ले जाएगा ।"
तभी मालिनी ने प्यार से अपना हाथ रूहानी के हाथों पर रखा, मानो वह उसे ढाढस बंधा रही हो। उसने बहुत ही गंभीर लहजे में चेतावनी दी,
"मालकिन, आपको बहुत ज़्यादा संभलकर रहना होगा। मुझे समझ नहीं आ रहा कि उसने उस श्राप को कैसे तोड़ा, लेकिन उसे आज भी एक वारिस की ज़रूरत है। और उस वारिस के लिए... उसे अपने बच्चों की ज़रूरत पड़ेगी ही।"
यह सुनते ही रूहानी का चेहरा डर के मारे पीला पड़ गया, और उसकी नीली आँखों में खौफ़ साफ़ झलकने लगा। कमरे की खिड़की से बाहर ठंडी हवा का एक तेज़ झोंका गुज़रा , जो उनके दिलों में बैठे डर को और गहरा कर गया। अब वे समझ चुकी थीं कि यह लड़ाई सिर्फ अद्वैत से दूर भागने की नहीं, बल्कि बच्चों के फ्यूचर को बचाने की थी।
। । अगले दिन सुबह । ।
रात भर की बेचैनी और मालिनी आंटी के उस 'श्राप' वाले डर के बाद जब रूहानी की आँख खुली, तो धूप खिड़की के शीशों को चमका रही थी। उसने अपने सुनहरे बालों को संभाला, शॉल ओढ़ी और सीढ़ियों से नीचे उतरने लगी। पूरे घर में अजीब सा सन्नाटा था।
'मैंने सुबह से बच्चों को आसपास नहीं देखा। शायद वे बाहर बगीचे में खेल रहे हैं?' रूहानी ने मन ही मन सोचा।
वह जैसे ही सीढ़ियों के आखिरी छोर पर पहुँची, उसे लॉन के बजाय किचन की तरफ से बर्तनों के टकराने और धीमी फुसफुसाहट की आवाज़ें सुनाई दीं।
'यह आवाज़ तो किचन से आ रही है...?' उसके कदम उस तरफ बढ़ गए। उसका दिल किसी अनजाने डर से धड़क रहा था।
उसने झिझकते हुए किचन का भारी लकड़ी का दरवाजा धकेला। दरवाजा एक हल्की सी चरमराहट के साथ खुला।
"अयान! अकीरा! क्या तुम दोनों यहाँ अंदर हो...?" रूहानी की आवाज़ गले में ही अटक गई, जब उसने अंदर का नजारा देखा।

किचन के स्लैब के पास अद्वैत खड़ा था। उसके काले बिखरे हुए बाल और उसकी वो गहरी, चमकीली आँखें सीधे रूहानी से टकराईं। लेकिन सबसे हैरान करने वाली बात यह थी कि जो अद्वैत कल तक इतना कड़क और डरावना लग रहा था, उसने इस वक्त दोनों बच्चों को अपनी मजबूत बाहों में उठा रखा था।
बच्चों के गालों पर सफेद आटा लगा हुआ था और वे दोनों खिलखिलाकर हंस रहे थे। अद्वैत के हाथ में लकड़ी का एक बड़ा कटोरा था— वे तीनों मिलकर शायद नाश्ता तैयार कर रहे थे। बच्चों के चेहरे पर अद्वैत के लिए कोई डर नहीं, बल्कि एक अजीब सा अपनापन था।
रूहानी को दरवाजे पर खड़े देख, अद्वैत के चेहरे पर एक बहुत ही हल्की, कातिलाना मुस्कान उभरी। उसने बेहद मखमली और भारी आवाज़ में कहा,
"गुड मॉर्निंग।"
उसने अद्वैत और बच्चों को इस तरह साथ देखकर थोड़े कड़े लहजे में पूछा,
"तुम यहाँ अंदर इनके साथ आखिर कर क्या रहे हो...?"
रूहानी की आवाज़ सुनते ही अद्वैत की गोद में बैठी अकीरा खुशी से उछल पड़ी। उसके गालों पर आटा लगा था और उसके हाथों में खरगोश के आकार का एक बहुत ही सुंदर, सिकी हुई गरमा -गरम कुकीज़ थी।
वह अपनी माँ को दिखाते हुए चहकी, "मम्मा, देखो! देखो मैंने क्या बनाया है!"
वह बेहद मासूमियत से मुस्कुराई और अपनी बड़ी-बड़ी नीली आँखों से रूहानी की तरफ देखते हुए आगे बोली,
"इन अंकल ने मेरी मदद की!"
अद्वैत ने रूहानी की तरफ देखा। उसकी आँखों में एक मद्धम सी चमक और होठों पर एक बहुत ही हल्की, शांत मुस्कान थी। लेकिन रूहानी के चेहरे के भाव अब भी कड़े थे। अतीत की यादें और मन का डर उसे अद्वैत पर इतनी आसानी से भरोसा करने की इजाजत नहीं दे रहे थे। उसने अपने जबड़े को भींचा और अद्वैत की आँखों में झांकते हुए एक सख्त फैसला लिया।
वह आगे बढ़ी और बच्चों का हाथ पकड़कर अपनी तरफ खींचते हुए बोली, "तुम दोनों, मेरे साथ चलो।"
अद्वैत चुपचाप रूहानी के इस रुख को देखता रहा। रूहानी ने जैसे ही बच्ची का हाथ पकड़ा और उसे अपने करीब खींचा, उसकी उंगलियों को अकीरा के शरीर की तपिश का अहसास हुआ। रूहानी का दिल धक से रह गया।
उसने तुरंत अकीरा के माथे पर अपना हाथ रखा। बच्ची का माथा बुखार से बुरी तरह तप रहा था।
रूहानी के मुंह से घबराहट में निकला,
"...रुको। तुम्हारा शरीर तो आग की तरह तप रहा है।"
वह तुरंत घुटनों के बल नीचे बैठी और अकीरा को अपने सीने से लगा लिया। वह फिक्र से बेहाल होकर उसके गालों को सहलाने लगी,
"क्या तुम ठीक हो? तुम्हें कब से ऐसा लग रहा है? कब से बुखार है तुम्हें?"
बुखार की तपन से बेहाल बच्ची ने अपनी माँ के कंधे पर सिर टिका दिया। उसकी आँखें बंद होने लगी थीं और वह बेहद कमजोर, लड़खड़ाती आवाज़ में बस इतना ही फुसफुसा पाई, "म्म्म्... पता नहीं..."
किचन के स्लैब के पास खड़ा अद्वैत अब पूरी तरह गंभीर हो चुका था। उसके चेहरे की वह मद्धम मुस्कान गायब हो गई और उसकी अंबर आँखें चिंता से गहरी हो गईं। उसने तुरंत स्थिति को संभाला और आरव की तरफ देखकर बेहद शांत लेकिन कड़े लहजे में कहा,
"अयान, क्या तुम अपनी बहन को लेकर उसके कमरे में जाओगे?"
अद्वैत ने रूहानी की तरफ देखा, जो बच्ची को संभाले हुए थी, और अपनी भारी आवाज़ में आगे कहा, "मैं कुछ तौलिये और गरमा- गरम दलिया लेकर अभी वहाँ पहुँचती हूँ।"
अयान ने तुरंत अपनी माँ और अद्वैत की तरफ देखा और अपनी बहन का हाथ थामते हुए आज्ञाकारी बच्चों की तरह बोला, "ठीक है!"
किचन का दरवाजा एक बार फिर हल्की सी चरमराहट के साथ खुला। अयान अपनी बीमार बहन का हाथ पकड़कर, उसे सहारा देते हुए किचन से बाहर कमरे की तरफ ले जाने लगा।
जैसे ही बच्चों के कदमों की आवाज़ गलियारे में दूर हो गई, किचन का शांत माहौल अचानक भारी तनाव में बदल गया।
रूहानी का जो गुस्सा अब तक बच्चों के सामने दबा हुआ था, वह ज्वालामुखी की तरह फट पड़ा। वह अद्वैत की तरफ मुड़ी, उसकी नीली आँखों में गुस्सा साफ चमक रहा था।
"तुम आखिर कर क्या रहे हो?!"रूहानी लगभग चिल्लाते हुए बोली। उसने अद्वैत के करीब आकर उस पर उंगली उठाई,
"मैंने तुम्हें साफ़- साफ़ कहा था कि बच्चों से दूर रहना और उनसे बातचीत करने की कोशिश मत करना!"
अद्वैत के चेहरे पर रूहानी के इस गुस्से का कोई असर नहीं हुआ। उसने बेहद शांति से अपने कंधे उचकाए और अपनी गहरी आँखें रूहानी पर टिकाते हुए कहा, "वे खुद पहले मेरे पास आए थे।"
"बात यह नहीं है...!" रूहानी ने झल्लाकर अपना सिर पकड़ लिया। उसका दिल डर और हताशा से डूब रहा था। उसने एक गहरी सांस ली और अपने माथे को सहलाते हुए दर्द भरी आवाज़ में बोली, "वे अभी उस उम्र में हैं जहाँ उन्हें अजनबी लोग दिलचस्प लगते हैं। उन्हें सही -गलत की समझ नहीं है।"
वह कुछ पल रुकी, फिर अद्वैत की आँखों में आँखें डालकर बेहद कड़े और चेतावनी भरे लहजे में बोली, "मैं खुद यह पक्का करूँगी कि वे अब से तुमसे दूर रहें। और मैं पूरी उम्मीद करती हूँ कि ऐसा दोबारा कभी नहीं होगा!"
इतना कहकर रूहानी गुस्से में मुड़ी। तभी मेज पर रखे बर्तनों और कुकीज़ के ट्रे से एक हल्की सी खटखटाहट की आवाज़ हुई।
अद्वैत ने रूहानी की इस पूरी डांट को बिना किसी शिकायत के सुना था। लेकिन जैसे ही रूहानी जाने के लिए पलटी, अद्वैत ने अपनी मजबूत हथेली को आगे बढ़ाया ।
उसकी सांवली और बड़ी हथेली पर एक छोटी सी, ताज़ा सिकी हुई चॉकलेट चिप कुकी रखी थी, जिससे अभी भी सोंधी सी खुशबू आ रही थी। उसने रूहानी के गुस्से को पूरी तरह नजरअंदाज करते हुए बेहद बेपरवाह और हल्के अंदाज़ में पूछा,
"क्या तुम एक चखना चाहोगी?"
कुछ पल के लिए ठिठक गई । उसकी समझ में नहीं आया कि इस कड़वाहट के बीच वह ऐसा क्यों कर रहा है।
उसने अविश्वास से पूछा, "... क्या?"
अद्वैत ने रूहानी की आँखों में देखा। उसकी आवाज़ में एक अजीब सी नरमी थी, "चिंता मत करो। मैंने इसे बच्चों के साथ मिलकर बनाया है। इसमें कोई अजीब या गलत चीज़ नहीं मिली है।"
रूहानी ने कुछ नहीं कहा, लेकिन उसके भीतर एक अजीब सी हलचल मच गई। अद्वैत अपनी जगह पर थोड़ा थमा, उसकी नजरें रूहानी के चेहरे की थकान पर टिक गईं।
उसने आगे कहा, "...मैंने ध्यान दिया है कि तुम कभी ठीक से कुछ खाती भी नहीं हो।"
अद्वैत के मुंह से यह बात सुनते ही रूहानी का दिल ज़ोर से धड़का। उसने घबराहट में खुद को थोड़ा पीछे खींचा । उसकी उंगलियाँ उसकी पोशाक के कपड़े को भींचने लगीं। क्या अद्वैत सच में इतने करीब से उस पर नजर रख रहा था? क्या उसे रूहानी के हर एक अकेले पल की खबर थी?
अद्वैत वहीं नहीं रुका। वह एक धीमा कदम बढ़ाकर रूहानी के और करीब आ गया। दोनों के बीच की दूरी अब इतनी कम थी कि रूहानी को अद्वैत की मौजूदगी का पूरा दबाव महसूस होने लगा। अद्वैत ने रूहानी के झुके हुए चेहरे और उसके बिखरे सुनहरे बालों की तरफ देखा।
उसने बेहद गहरे और भावुक लहजे में फुसफुसाते हुए कहा, "मैं अंदाज़ा भी नहीं लगा सकता कि इतने सालों से, ये रातें तुम्हारे लिए कितनी लंबी और भारी रही होंगी।"
अनन्या का चेहरा अविश्वास से भरा था, वह समझ नहीं पा रही थी कि अद्वैत किस बारे में बात कर रहा है।
"तुम... किस बारे में बात कर रहे हो?" उसने अद्वैत की आँखों में झांकते हुए पूछा।
अद्वैत ने बिना कोई जवाब दिए, फुर्ती से अपना हाथ आगे बढ़ाया । उसकी उंगलियों ने बहुत ही कोमलता से रूहानी के होठों को छुआ और उसके निचले होठ को थोड़ा नीचे की तरफ खींचा, मानो वह वहाँ कुछ देख रहा हो।
"यह," अद्वैत ने बेहद शांत और गंभीर आवाज़ में कहा, "मुझे यकीन है कि तुम अब तक अपने मवेशियों (जानवरों ) के खून से काम चला रही होगी। क्या मैं सही हूँ?"
अद्वैत की उँगलियों का स्पर्श और उसके मुंह से यह खौफनाक सच सुनते ही रूहानी के बदन में बिजली दौड़ गई। उसने झटके से अद्वैत का हाथ अपने चेहरे से हटाया ।
"तुम आखिर क्या करने की फिराक में हो?!" रूहानी गुस्से और डर के मारे हांफते हुए चिल्लाई, "अगर तुमने कुछ भी गड़बड़ करने की कोशिश की, तो इस बार मैं तुम्हें इसी वक्त अपने घर से बाहर निकाल फेंकूँगी!!"
अद्वैत ने रूहानी के इस चरम गुस्से को देखा। उसकी आँखों में कोई नाराजगी नहीं थी, बल्कि एक गहरा ठहराव और फिक्र थी। उसने अपनी भारी और मखमली आवाज़ में रूहानी को शांत करने की कोशिश की,
"शांत हो जाओ, रूहानी।"
उसने एक धीमा कदम आगे बढ़ाया और अपनी बात पूरी करते हुए कहा, "मैं सिर्फ तुम्हारी मदद करना चाहता हूँ।"
अद्वैत ने उसकी आँखों में देखते हुए उस बड़े राज़ से पर्दा उठाया जो वह इतने दिनों से छुपाकर तैयार कर रहा था, "तुम्हें पूरी तरह ठीक करने की वो दवा... वो काढ़ा (Potion) बस कुछ ही दिनों में बनकर तैयार हो जाएगा।"
कमेंट करे । रिव्यू ज़रूर दे । मुझे फोलो करें ।
मुझे प्रोत्साहन देने के लिए स्टिकर्स भेजे ।





Write a comment ...